बाबा साहब भीमराव आंबेडकर पहले लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हार गए थे

दुर्भाग्य से, बाबासाहब की जयंतियों व निर्वाण दिवसों पर अनेकानेक समारोही आयोजनों के बावजूद हमारी नई पीढ़ी को उनके व्यक्तित्व व कृतित्व के बारे में ज्यादा जानकारियां नहीं हैं. उनके लिखे-पढ़े और कहे पर भी या तो चर्चा ही नहीं होती या खास राजनीतिक नजरिए से होती है, जिस कारण उनका असली मन्तव्य सामने नहीं आ पाता.

सो, कम ही लोग जानते हैं कि आजादी के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व में बनी देश की पहली अंतरिम सरकार में वे विधि और न्यायमंत्री हुआ करते थे. बाद में कई मुद्दों पर कांग्रेस से नीतिगत मतभेदों के कारण उन्होंने 27 सितंबर, 1951 को पंडित नेहरू को पत्र लिखकर मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया और अपने द्वारा 1942 में गठित जिस शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन यानी अनुसूचित जाति संघ को स्वतंत्रता संघर्ष की व्यस्तताओं के कारण ठीक से खड़ा नहीं कर पाये थे, उसको नए सिरे से मजबूत करने में लग गए.

1952 का पहला आम चुनाव आया तो उन्होंने उक्त फेडरेशन के बैनर पर 35 प्रत्याशी खड़े किए. लेकिन उन दिनों देशवासियों में कांग्रेस के प्रति कुछ ऐसा कृतज्ञता का भाव था कि उनके सिर्फ दो ही प्रत्याशी जीत सके. खुद डाॅ. आंबेडकर महाराष्ट्र की बंबई शहर उत्तरी सीट से चुनाव हार गए. उन दिनों की व्यवस्था के अनुसार इस सीट से दो सांसद चुने जाने थे और दोनों सी चुन लिए गए.

दुर्भाग्य से, बाबासाहब की जयंतियों व निर्वाण दिवसों पर अनेकानेक समारोही आयोजनों के बावजूद हमारी नई पीढ़ी को उनके व्यक्तित्व व कृतित्व के बारे में ज्यादा जानकारियां नहीं हैं. उनके लिखे-पढ़े और कहे पर भी या तो चर्चा ही नहीं होती या खास राजनीतिक नजरिए से होती है, जिस कारण उनका असली मन्तव्य सामने नहीं आ पाता.

सो, कम ही लोग जानते हैं कि आजादी के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व में बनी देश की पहली अंतरिम सरकार में वे विधि और न्यायमंत्री हुआ करते थे. बाद में कई मुद्दों पर कांग्रेस से नीतिगत मतभेदों के कारण उन्होंने 27 सितंबर, 1951 को पंडित नेहरू को पत्र लिखकर मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया और अपने द्वारा 1942 में गठित जिस शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन यानी अनुसूचित जाति संघ को स्वतंत्रता संघर्ष की व्यस्तताओं के कारण ठीक से खड़ा नहीं कर पाये थे, उसको नए सिरे से मजबूत करने में लग गए.

1952 का पहला आम चुनाव आया तो उन्होंने उक्त फेडरेशन के बैनर पर 35 प्रत्याशी खड़े किए. लेकिन उन दिनों देशवासियों में कांग्रेस के प्रति कुछ ऐसा कृतज्ञता का भाव था कि उनके सिर्फ दो ही प्रत्याशी जीत सके. खुद डाॅ. आंबेडकर महाराष्ट्र की बंबई शहर उत्तरी सीट से चुनाव हार गए. उन दिनों की व्यवस्था के अनुसार इस सीट से दो सांसद चुने जाने थे और दोनों कांग्रेसी चुन लिए गए.

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