वेद, उपनिषद, पुराण को विश्व तक पहुचाने वाले अंग्रेज विद्वान मैक्समूलर जब स्वामी विवेकानंद से मिले

आप भारत कब आ रहे हैं? वहाँ का हर नागरिक उस व्यक्ति की अगवानी करना चाहता है जिसने उसके पुरखों के विचारों को सही रौशनी में रखने के लिए कितना कुछ किया। अमेरिका से इंग्लैंड लौटने पर जब स्वामी विवेकानंद मैक्समूलर से मिले तो पश्चिम के इस संत का चेहरा दमकने लगा, उनकी आँखें भरभरा गईं, उन्होंने धीमे से कहा तब मैं वहाँ से लौटुंगा नहीं, तुम्हें मेरा अंतिम संस्कार वहीं करना होगा।
स्वामी जी ने मैक्समूलर से मुलाकात के कुछ दिनों बाद मद्रास से प्रकाशित ब्रह्मवादिन में मैक्समूलर से मुलाकात का वर्णन लिखा है। मुलाकात के बारे में लेख में अंतिम रूप से लिखा गया है।

तत्चेतसा स्मरति नूनमबोधपूर्वं ।
भावस्थिराणि जननान्तरसौहृदानि।।

उसे अपने पूर्वजन्म की मित्रताओं की स्मृति याद है जो उसके हृदय में जड़ों की तरह भलीभांति जमी हैं।
विवेकानंद से मिलने के पूर्व ही मैक्समूलर रामकृष्ण पर एक लेख लिख चुके थे, इसे गौरवपूर्ण ढंग से स्वामी जी ने पत्र में वर्णित किया है। बातचीत में स्वामी जी ने कहा कि रामकृष्ण आज हजारों द्वारा पूजे जाते हैं।

मैक्समूलर ने उत्तर दिया अगर उन्हें नहीं पूजा जाएगा तो किसे पूजा जाएगा। फिर मैक्समूलर ने उन्हें लंच करने कहा। फिर आक्सफोर्ड के कई कॉलेजों की सैर कराई और इतना समय क्यों खर्च किया? मैक्समूलर ने कहा कि हर दिन ऐसा नहीं होता कि कोई रामकृष्ण परमहंस के शिष्य से मिले।

मुलाकात पर स्वामी जी ने लिखा। प्रोफेसर मैक्समूलर कितने अद्भुत व्यक्ति हैं। मेरे लिए उनके घर जाना तीर्थयात्रा जैसा अनुभव था।
उनका भारत के प्रति प्यार कितना हैं मैं चाहता हूँ कि कम से कम मेरे मन में भी यह स्नेह कम से कम उनके प्रेम का शतांश तो हो ही। मैंने एक ऐसी आत्मा को देखा जो हर दिन ब्रह्म से एकाकार हो रही, एक ऐसा हृदय जो हर क्षण ब्रह्माँड से एकाकार होने के लिए स्वयं को विस्तारित कर रहा है।

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