1971 के युद्ध की सच्ची घटना जब पाकिस्तान की कैद से भाग निकले 3 भारतीय सैनिक

रेड वन, यू आर ऑन फ़ायर’…स्क्वाड्रन लीडर धीरेंद्र जाफ़ा के हेडफ़ोन में अपने साथी पायलट फ़र्डी की आवाज़ सुनाई दी। दूसरे पायलट मोहन भी चीख़े, ‘बेल आउट रेड वन बेल आउट।’ तीसरे पायलट जग्गू सकलानी की आवाज़ भी उतनी ही तेज़ थी, ‘जेफ़ सर… यू आर…. ऑन फ़ायर…. गेट आउट…. फ़ॉर गॉड सेक…. बेल आउट..’

जाफ़ा के सुखोई विमान में आग की लपटें उनके कॉकपिट तक पहुंच रही थीं। विमान उनके नियंत्रण से बाहर होता जा रहा था। उन्होंने सीट इजेक्शन का बटन दबाया जिसने उन्हें तुरंत हवा में फेंक दिया और वो पैराशूट के ज़रिए नीचे उतरने लगे।जाफ़ा बताते हैं कि जैसे ही वो नीचे गिरे नार-ए-तकबीर और अल्लाह हो अकबर के नारे लगाती हुई गाँव वालों की भीड़ उनकी तरफ़ दौड़ी। लोगों ने उन्हें देखते ही उनके कपड़े फाड़ने शुरू कर दिए। किसी ने उनकी घड़ी पर हाथ साफ़ किया तो किसी ने उनके सिगरेट लाइटर पर झपट्टा मारा।सेकेंडों में उनके दस्ताने, जूते, 200 पाकिस्तानी रुपए और मफ़लर भी गायब हो गए। तभी जाफ़ा ने देखा कि कुछ पाकिस्तानी सैनिक उन्हें भीड़ से बचाने की कोशिश कर रहे हैं। एक लंबे चौड़े सैनिक अफ़सर ने उनसे पूछा, ‘तुम्हारे पास कोई हथियार है?’ जाफ़ा ने कहा, ‘मेरे पास रिवॉल्वर थी, शायद भीड़ ने उठा ली।’

‘क्या जख़्मी हो गए हो?’
‘लगता है रीढ़ की हड्डी चली गई है। मैं अपने शरीर का कोई हिस्सा हिला नहीं सकता।’ जाफ़ा ने कराहते हुए जवाब दिया। उस अफ़सर ने पश्तो में कुछ आदेश दिए और जाफ़ा को दो सैनिकों ने उठा कर एक टेंट में पहुंचाया। पाकिस्तानी अफ़सर ने अपने मातहतों से कहा, इन्हें चाय पिलाओ।जाफ़ा के हाथ में इतनी ताक़त भी नहीं थी कि वो चाय का मग अपने हाथों में पकड़ पाते। एक पाकिस्तानी सैनिक उन्हें अपने हाथों से चम्मच से चाय पिलाने लगा। जाफ़ा की आखें कृतज्ञता से नम हो गईं।भीगते हुए वो तेज़ क़दमों से चल कर बस स्टेशन पहुंच गए। वहाँ पर एक कंडक्टर चिल्ला रहा था, ‘पेशावर जाना है भाई? पेशावर! पेशावर!’ तीनों लोग कूद कर बस में बैठ गए। सुबह के छह बजते बजते वो पेशावर पहुंच गए। वहाँ से उन्होंने जमरूद रोड जाने के लिए तांगा किया। तांगे से उतरने के बाद उन्होंने पैदल चलना शुरू कर दिया।फिर वो एक बस पर बैठे। उसमें जगह नहीं थी तो कंडक्टर ने उन्हें बस की छत पर बैठा दिया। जमरूद पहुंच कर उन्हें सड़क पर एक गेट दिखाई दिया। वहाँ पर एक साइन बोर्ड पर लिखा था, ‘आप जनजातीय इलाक़े में घुस रहे हैं। आगंतुकों को सलाह दी जाती है कि आप सड़क न छोड़ें और महिलाओं की तस्वीरें न खीचें।’

फिर एक बस की छत पर चढ़ कर वो साढ़े नौ बजे लंडी कोतल पहुंच गए। अफ़गानिस्तान वहाँ से सिर्फ़ 5 किलोमीटर दूर था। वो एक चाय की दुकान पर पहुंचे। गरेवाल ने चाय पीते हुए बगल में बैठे एक शख़्स से पूछा… यहाँ से लंडीखाना कितनी दूर है। उसको इस बारे में कुछ भी पता नही था।दिलीप ने नोट किया कि स्थानीय लोग अपने सिर पर कुछ न कुछ पहने हुए थे। उन जैसा दिखने के लिए दिलीप ने दो पेशावरी टोपियाँ ख़रीदी। एक टोपी गरेवाल के सिर पर फ़िट नहीं आई तो दिलीप उसे बदलने के लिए दोबारा उस दुकान पर गए।

तहसीलदार के अर्ज़ीनवीस को शक हुआ
जब वो वापस आए तो चाय स्टाल का लड़का ज़ोर से चिल्लाने लगा कि टैक्सी से लंडीखाना जाने के लिए 25 रुपए लगेंगे। ये तीनों टैक्सीवाले की तरफ़ बढ़ ही रहे थे कि पीछे से एक आवाज़ सुनाई दी। एक प्रौढ़ व्यक्ति उनसे पूछ रहा था क्या आप लंडीखाना जाना चाहते हैं? उन्होंने जब ‘हाँ’ कहा तो उसने पूछा आप तीनों कहाँ से आए हैं?दिलीप और गैरी ने अपनी पहले से तैयार कहानी सुना दी। एकदम से उस शख़्स की आवाज़ कड़ी हो गई। वो बोला, ‘यहाँ तो लंडीखाना नाम की कोई जगह है ही नहीं।.. वो तो अंग्रेज़ों के जाने के साथ ख़त्म हो गई।’

उसे संदेह हुआ कि ये लोग बंगाली हैं जो अफ़गानिस्तान होते हुए बांगलादेश जाना चाहते हैं। गरेवाल ने हँसते हुए जवाब दिया, ‘क्या हम आप को बंगाली दिखते हैं? आपने कभी बंगाली देखे भी हैं अपनी ज़िंदगी में?’बहरहाल तहसीलदार के अर्ज़ीनवीस ने उनकी एक न सुनी। वो उन्हें तहसीलदार के यहाँ ले गया। तहसीलदार भी उनकी बातों से संतुष्ट नहीं हुआ और उसने कहा कि हमें आप को जेल में रखना होगा।

एडीसी उस्मान को फ़ोन
अचानक दिलीप ने कहा कि वो पाकिस्तानी वायुसेना के प्रमुख के एडीसी स्क्वाड्रन लीडर उस्मान से बात करना चाहते हैं। ये वही उस्मान थे जो रावलपिंडी जेल के इंचार्ज थे और भारतीय युद्धबंदियों के लिए क्रिसमस का केक लाए थे। उस्मान लाइन पर आ गए। दिलीप ने कहा, ‘सर आपने ख़बर सुन ही ली होगी। हम तीनों लंडीकोतल में हैं। हमें तहसीलदार ने पकड़ रखा है। क्या आप अपने आदमी भेज सकते हैं?’

उस्मान ने कहा कि तहसीलदार को फ़ोन दें। उन्होंने कहा कि ये तीनों हमारे आदमी हैं। इन्हें बंद कर दीजिए, हिफ़ाज़त से रखिए लेकिन पीटिए नहीं। दिलीप पारुलकर ने बीबीसी को बताया कि ये ख़्याल उन्हें सेकेंडों में आया था। उन्होंने सोचा कि वो इसका ज्यूरिस्डिक्शन इतनी ऊपर तक पहुंचा देंगे कि तहसीलदार चाह कर भी कुछ नहीं कर पाएगा।

उधर 11 बजे रावलपिंडी जेल में हड़कंप मच गया। जाफ़ा की कोठरी के पास गार्डरूम में फ़ोन की घंटी सुनाई दी। फ़ोन सुनते ही एकदम से हलचल बढ़ गई। गार्ड इधर उधर बेतहाशा भागने लगे। बाक़ी बचे सातों युद्धबंदियों को अलग कर अँधेरी कोठरियों में बंद कर दिया गया।एक गार्ड ने कहा, ‘ये सब जाफ़ा का करा धरा है। इसको इस छेद के मने डालो और गोली मार दो। हम कहेंगे कि ये भी उन तीनों के साथ भागने की कोशिश कर रहा था।’जेल के उप संचालक रिज़वी ने कहा, ‘दुश्मन आख़िर दुश्मन ही रहेगा। हमने तुम पर विश्वास किया और तुमने हमें बदले में क्या दिया।’ फिर सब युद्धबंदियों को लायलपुर जेल ले जाया गया। वहाँ भारतीय थलसेना के युद्धबंदी भी थे। एक दिन अचानक वहाँ पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो पहुंचे।

उन्होंने भाषण दिया, “आपकी सरकार को आपके बारे में कोई चिंता नहीं है। लेकिन मैंने अपनी तरफ़ से आपको छोड़ देने का फ़ैसला किया है।” एक दिसंबर, 1972 को सारे युद्धबंदियों ने वाघा सीमा पार की। उनके मन में क्षोभ था कि उनकी सरकार ने उन्हें छुड़ाने के लिए कुछ भी नहीं किया। भुट्टो की दरियादिली से उन्हें रिहाई मिली।लेकिन जैसे ही उन्होंने भारतीय सीमा में क़दम रखा वहाँ मौजूद हज़ारों लोगों ने मालाएं पहना और गले लगा कर उनका स्वागत किया। पंजाब के मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह ख़ुद वहाँ मौजूद थे। वाघा से अमृतसर के 22 किलोमीटर रास्ते में इनके स्वागत में सैकड़ों वंदनवार बनाए गए थे। लोगों का प्यार देखकर इन युद्धबंदियों का ग़ुस्सा जाता रहा। अगले दिन दिल्ली में राम लीला मैदान में इनका सार्वजनिक अभिनंदन किया गया।

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