आखिर क्यों मीराबाई से मिलने को बेताब था सम्राट अकबर ? यह है इसका कारण

जब भी भगवान श्री कृष्ण की चर्चा होती है तो मीराबाई का नाम अवश्य लिया जाता है क्योंकि उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन द्वारकाधीश श्री कृष्ण को समर्पित कर दिया | घर परिवार और गृहस्थ सब कुछ त्यागकर मीराबाई ने अपना सम्पूर्ण जीवन कृष्ण भक्ति में लगा दिया |बात उस वक्त की है जब अपनी कविताओं और रचनाओं के बल पर मीराबाई धीरे-धीरे पूरे भारत में प्रसिद्ध हो गईं थी। इसी कारण मुगल शहंशाह अकबर ने भी मीराबाई से मिलने की इच्छा प्रकट की | अकबर का हिन्दू धर्म के प्रति विशेष लगाव था। यह भी सत्य है कि मुगल राज में ही सम्राट अकबर द्वारा कई मंदिरों और पूजा स्थलों का निर्माण भी कराया गया । लेकिन उस वक्त मीराबाई के पति और उदयपुर के महाराणा भोजराज और अकबर के बीच संबंध ठीक नहीं थे।

इसीलिए अकबर ने अपने दरबार के नव रत्नों में से एक तानसेन की सहायता ली। दोनों संन्यासी का रूप धारण करके उस मंदिर में जा पहुंचे जहां मीराबाई रोजाना भजन-कीर्तन किया करती थीं। वहाँ जाकर मीराबाई की सुरीली आवाज से अकबर इतना अधिक मंत्रमुग्ध हो गए कि खड़े होकर मीरा के समक्ष ही श्रीकृष्ण की प्रतिमा पर मोतियों की माला अर्पित कर दी।

यह देखकर सभी हैरान हो गये कि एक सन्यासी इतने बेशकीमती रत्नों कैसे दान कर सकता है। लोगों की शक भरी नज़रों से बचते हुए अकबर और तानसेन मंदिर से थोड़ी ही देर में गायब हो गए। बाद में लोगों को मालूम हुआ कि वे कोई सन्यासी नहीं बल्कि मुग़ल शहंशाह अकबर और उस्ताद तानसेन थे। यदि आपको हमारी यह पोस्ट पसंद आई हो तो जय श्री कृष्ण अवश्य लिखें और आगे भी ऐसी ही ज्ञानवर्धक जानकारी पाने के लिए कृपया हमें फॉलो करें |

Sharing is caring!

Leave a Comment