जब शेख हसीना (Sheikh Hasina) के पूरे परिवार का कर दिया गया कत्ल तो इंदिरा ने भारत में दी थी पनाह

हसीना को फोर्ब्‍स मैगजीन की दुनिया की 100 शक्तिशाली महिलाओं की लिस्‍ट में साल 2018 में 26वां स्‍थाना हासिल हुआ है। उनकी पार्टी आवामी लीग साल 2008 से सत्‍ता में है। 350 सीटों वाली बांग्‍लादेश की संसद में 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। देश में पिछले 10 वर्षों से जारी आर्थिक सुधारों के लिए अक्‍सर हसीना को श्रेय दिया जाता है। देश की 160 मिलियन आबादी की जीवन दर पड़ोसी मुल्‍क भारत से भी कहीं ज्‍यादा है। यहां पर लोगों ने अनाज उत्‍पादन में भी रिकॉर्ड कायम कर डाला है। शेख हसीना पहली बार साल 1996 में बांग्‍लादेश की पीएम चुनी गई थीं। वह साल 2001 तक सत्‍ता में रहीं और इसके बाद खालिदा जिया ने सत्‍ता पर नियंत्रण कर लिया। शेख हसीना ने अपने पिता शेख मुजिबर रहमान की मृत्‍यु के बाद साल 1981 में आवामी लीग पार्टी जिम्‍मेदारी उठाई।

15 अगस्‍त सन् 1975 में हुए तख्‍तापलट में हसीना के परिवार के सदस्यों की हत्‍या कर दी गई थी। उनकी मां, तीनों भाई और उनके पिता को भी मार डाला गया था। हसीना के पिता शेख मुजिबर रहमान सन् 1971 में बांग्‍लादेश के गठन होने के बाद देश के पहले राष्‍ट्रपति बने। रहमान ने ही इस वर्ष पाकिस्‍तान के खिलाफ हुए संघर्ष में देश की अगुवाई की थी। जिस समय परिवार के सदस्‍यों की हत्‍या हुई, हसीना और उनकी बहन रेहाना ब्रसेल्‍स में थीं। हत्‍या की खबर सुनकर दोनों सदमे की हालत में थीं और उन्‍हें एक पल को यकीन नहीं हो रहा था कि अब उनके घर में कोई नहीं बचा है। ब्रसेल्‍स में हसीना के साथ उनके पति डाक्टर एमए वाजेद और बहन रेहाना बांगलादेश के राजदूत सनाउल हक के घर पर ठहरे हुए थे।

शेख हसीना को साल 1975 से साल 1981 तक दिल्ली में रहना पड़ा। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनकी गुजारिश के बाद में उन्हें परिवार समेत यहां शरण दी थी। हसीना के साथ-साथ उनके पति वैज्ञानिक एमए वाजेद मियां और दोनों बच्चे दिल्ली स्थित पंडारा पार्क में रहते थे। कुछ दिनों बाद वह लाजपत नगर में रहने लगी थीं। जिस समय हसीना भारत लौटीं थी तो भारत में इमरजेंसी लगी हुई थी। यहां पर इंदिरा सरकार के सामने भी काफी चुनौतियां थीं लेकिन इसके बाद भी हसीना को भारत के शरण दी गई थी। हसीना को भारत में शरण मिल सके इसमें उस समय जर्मनी में राजदूत रहे वाइ के पुरी ने अहम रोल अदा किया था। 24 अगस्त, 1975 को एयर इंडिया के विमान से शेख हसीना और उनका परिवार दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पहुंचा। हसीना को भारत प्रवास के दौरान सख्‍त निर्देश थे कि वह न तो घर से बाहर निकलें और न ही किसी से मिले जुले। हसीना के रहने का सारा खर्च उस समय भारत सरकार ने ही उठाया था।

अगस्‍त 2004 में हसीना एक राजनीतिक रैली में थी और तभी एक ग्रेनेड अटैक हुआ। हमले में 20 लोगों की मौत हो गई लेकिन हसीना की जान बच गई। उनकी कार पर गोलियों की बौछार हुई और गोलियों की बौछार के बीच वह वहां से बच निकलने में कामयाब हुईं। बांग्‍लादेश में शेख हसीना और खालिदा जिया को ‘लड़ने वाली बेगमों’ के तौर पर जाना जाता है और सन् 1990 में दोनों को यह निकनेम दिया गया था। दोनों ने ही मिलिट्री तानाशाह हुसैन मोहम्‍मद के शासन को उखाड़ फेंकने में बड़ा रोल अदा किया और फिर उन्‍हें इस उपाधि से देश में नवाजा गया। खालिदा जिया और हसीना दोनों के बीच कभी नहीं बनी। दोनों के समर्थक अक्‍सर ही लड़ते रहते हैं। इनके बीच में तनाव इतना बढ़ गया कि जनवरी 2007 में देश में मिलिट्री रूल लगा दिया गया और एक कार्यवाहक सरकार की नियुक्ति हुई। दोनों को भ्रष्‍टाचार के आरोपों के जेल में भी डाल दिया गया था।

हसीना के कार्यकाल में जेल में बंद कई कैदियों की हत्‍या को अंजाम दिया गया। इस वजह से ही उनके अलोचक उन्‍हें तानाशाह बुलाते हैं। वहीं समर्थकों की मानें तो वह लोगों के लिए लड़ाई लड़ने में यकीन करती हैं। हाल ही में जब बांग्‍लादेश रोहिंग्‍या संकट से गुजरा तो उस समय हसीना की काफी तारीफ हुई। लोगों ने कहा कि हसीना ने काफी सूझ-बूझ से इस संकट को सुलझाया है। हसीना को एक वर्कहोल्कि पीएम के तौर पर देखा जाता है। उनके मंत्रियों की मानें तो पीएम अपना टाइम मैनेजमेंट कैसे करती हैं, आज तक इसका पता नहीं लग पाया है। वह काफी जल्‍दी जाग जाती हैं और फिर सुबह की नमाज के साथ उनके दिन की शुरुआत होती है। इसके बाद वह ऑफिस पहुंचती हैं जहां पर आधी रात तक वह काम करती हैं। उनके एक करीबी की मानें तो हसीना रोज कुरान पढ़ती है। एक भी दिन ऐसा नहीं जाता है जब वह अपने पार्टी के नेताओं से मुलाकात न करती हों।

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