सरोजिनी नायडू: जो महात्मा गांधी को कहती थीं ‘मिकी माउस’

सरोजिनी नायडू का जन्म 13 फरवरी 1879 को हैदराबाद में हुआ था. उनके पिता अघोरनाथ चट्टोपाध्याय एक नामी विद्वान तथा और कवियित्री थीं. बचपन से ही सरोजिनी नायडू बहुत होशियार थीं. उन्होंने 12 साल की आयु में ही 12 वीं की परीक्षा अच्छे अंकों के साथ पास कर ली थी. उन्होंने 13 साल की आयु में ‘लेडी ऑफ दी लेक’ नामक कविता लिख दी थी. 1895 में 16 साल की उम्र में उन्हें हैदराबाद के निजाम की ओर से स्कॉलरशिप मिल गई और वे पढ़ने के लिए पहले लंदन के किंग्स कॉलेज और बाद में ग्रिटन कॉलेज कैम्ब्रिज गईं.

वे गांधीजी से पहली बार भारत में नहीं बल्कि ब्रिटेन में मिली थींबहुत कम लोग जानते हैं कि गांधीजी से सरोजिनी नायडू की पहली मुलाकात इंग्लैंड में हुई थी. ये 1914 की बात है. गांधी जी अपने दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह के चलते प्रसिद्ध हो चुके थे. सरोजिनी नायडू उस समय इंग्लैंड में थीं. जब उन्होंने सुना कि गांधीजी भी इंग्लैंड में हैं, तब वो उनसे मिलने गईं.

गांधीजी को देखकर चौंकीं लेकिन प्रभावित भी हुईंउन्होंने देखा कि गांधीजी जमीन पर कंबल बिछाकर बैठे हुए हैं और उनके सामने टमाटर और मूंगफली का भोजन परोसा हुआ है. सरोजिनी नायडू गांधी की प्रशंसा सुन चुकी थीं, पर उन्हें कभी देखा नहीं था. जैसा कि वो खुद वर्णन करती हैं, ‘कम कपड़ों में गंजे सिर और अजीब हुलिये वाला व्यक्ति और वो भी जमीन पर बैठकर भोजन करता हुआ.’

गांधी जी के ऐसे व्यक्तित्व से सरोजिनी नायडू बहुत प्रभावित हुईं और गांधी जी के विचारों से प्रभावित होकर ही वे देश के लिए समर्पित हो गईं. उन्होंने एक कुशल सेनापति के रूप में अपनी प्रतिभा का परिचय सत्याग्रह और संगठन में भी दिया. उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलनों का नेतृत्व किया और जेल भी गयीं.नाभा की राजकुमारी और उनकी बेटी के साथ सरोजिनी नायडूदोनों के आपस में थे बहुत दोस्ताना संबंधगांधीजी ने उनके भाषणों से प्रभावित होकर उन्हें ‘भारत कोकिला’ की उपाधि दी थी. लेकिन वो अपने पत्रों में उन्हें कभी-कभी ‘डियर बुलबुल’,’डियर मीराबाई’ तो यहां तक कि कभी मजाक में ‘अम्माजान’ और ‘मदर’ भी लिखते थे. मजाक के इसी अंदाज में सरोजिनी भी उन्हें कभी ‘जुलाहा’, ‘लिटिल मैन’ तो कभी ‘मिकी माउस’ संबोधित करती थीं.

वैसे जब देश में आजादी के साथ भड़की हिंसा को शांत कराने का प्रयत्न महात्मा गांधी कर रहे थे, उस वक्त सरोजनी नायडू ने उन्हें ‘शांति का दूत’ कहा था और हिंसा रुकवाने की अपील की थी. सरोजिनी नायडू 1925 में कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन में कांग्रेस की दूसरी महिला अध्यक्ष बनीं. वे भारत की पहली महिला गवर्नर भी थीं. आजादी के बाद उन्हें संयुक्त प्रांत का राज्यपाल बनाया गया था.

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