‘शेरदिल मां’ जिसने अपनी बेटी को तीन बलात्कारियों से बचाया

फ़ोन लाइन के दूसरी तरफ़ एक लड़की थी जो वहां से महज 500 मीटर की दूरी पर थी. उसने जल्दी से यह भी बताया, ‘मैडम आपकी बेटी सिफोकाज़ी के साथ तीन लोग बलात्कार कर रहे हैं.’नोक्यूबॉन्गा ने सबसे पहले पुलिस को फ़ोन किया लेकिन उधर से कोई जवाब नहीं आया. वो जानती थी कि पूर्वी केप में बसे उस गांव तक पहुंचने में काफ़ी वक़्त लगेगा. उस समय सिर्फ़ वो ही अपनी बेटी के लिए कुछ कर सकती थीं.

उन्होंने बीबीसी से बताया, “मैं डरी हुई थी लेकिन मुझे जाना ही पड़ा क्योंकि वो मेरी बेटी थी. मुझे लग रहा था कि मैं जब तक उस तक पहुंच पाऊंगी, वो मर चुकी होगी…क्योंकि वो उन्हें जानती थी और अपराधी भी उसे जानते थे. मुझे लगा कि वो उसे मार डालेंगे ताकि हम पुलिस में इसकी रिपोर्ट न करा सकें.”

सिफोकाज़ी उसी गांव में अपने दोस्तों से मिलने गई थीं. उनके साथ उनकी चार सहेलियां और थीं लेकिन वो रात 1:30 बजे बाहर चली गईं और वो वहां अकेली सोती रह गईं. इसके बाद उसी गांव के तीन लोगों ने उन पर हमला कर दिया.फ़ोन आने के बाद नोक्यूबॉन्गा किचन में गईं और चाकू उठाया. वो बताती हैं, “मैंने चाकू अपनी सुरक्षा के लिया था क्योंकि वहां तक पैदल पहुंचना सुरक्षित नहीं था और बाहर बहुत अंधेरा भी था. मैं अपने फ़ोन की लाइट जलाकर वहां पहुंची.”जैसे ही वो उस घर के पास पहुंचीं उन्हें अपनी बेटी की चीखें सुनाईं पड़ीं. उन्होंने फ़ोन की रोशनी में ही अपनी बेटी का बलात्कार होते हुए देखा.वो बताती हैं, “मैं बहुत डर गई थी… मैं बस दरवाजे पर खड़ी रही और उनसे पूछा कि वो क्या कर रहे हैं. जब उन्होंने मुझे देखा तो वे तेज़ी से मेरी तरफ़ आने लगे. तब मुझे लगा कि मुझे ख़ुद को बचाने की ज़रूरत है. ये सब अपने आप हुआ.”

ये साफ़ है कि जब वो तीनों नोक्यूबॉन्गा पर हमला करने के इरादे से उन पर झपटे उन्होंने भी उन पर चाकू से पलटवार किया. इसमें एक की चाकू घोंपे जाने से मौत हो गई और दो गंभीर रूप से घायल हो गए.इसके बाद नोक्यूबॉन्गा वहां एक पल भी नहीं रुकीं और अपनी बेटी को उसकी सहेली के घर लेकर चली गईं. उन पर हत्या का मुक़दमा चला लेकिन लोगों के ग़ुस्से की वजह से उनकी सज़ा रोक दी गई.अदालत में जज ने कहा कि नोक्यूबॉन्गो वो मंज़र देखकर ‘बेहद भावुक’ हो गईं जब एक व्यक्ति उनकी बेटी का बलात्कार कर रहा था और बाकी दो वहीं पास खड़े अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे.जज ने कहा, “मैं समझता हूं कि वो बेहद गुस्से में थीं. उन्हें ख़ुद को और अपनी बेटी की मौत का डर भी सता रहा था.”हत्या की ख़बर फ़ैलने पर पुलिस ने नोक्यूबॉन्गा को गिरफ़्तार कर लिया. उन्हें स्थानीय पुलिस स्टेशन में ले जाकर हवालात में डाल दिया गया.वो कहती हैं, “मैं सिर्फ़ अपनी बच्ची के बारे में सोच रही थी. मुझे उसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिल रही थी. ये बहुत दर्दनाक अनुभव था.”

सिफोकाज़ी अब भी सदमे में और हमले के बारे में उन्हें बहुत ज़्यादा चीजें याद नहीं हैं. उन्हें जो याद है वो ये कि दो दिन बाद उन्होंने अस्पताल में अपनी मां की आवाज़ सुनी जब वो ज़मानत पर रिहा होकर उनके पास पहुंची थीं.उस दिन से दोनों मां-बेटी एक दूसरे का सहारा बन गईं हैं, एक दूसरे का भावनात्मक संबल बन गई हैं. सिफाकोज़ी ने बताया, “मुझे किसी मनोवैज्ञानिक से काउंसलिंग नहीं मिली लेकिन मेरी मां मेरी मदद कर रही हूं. मैं उबर रही हूं.”नोक्यूबॉन्गा अब इस कोशिश में लगी हैं कि ज़िंदगी पहले जैसी हो जाए.वो कहती हैं, “मैं अब भी उसकी मां हूं और अब भी वो मेरी बेटी है.” नोक्यूबॉन्गी मज़ाक में हंसते हुए कहती हैं कि सिफोकाज़ी शादी नहीं कर सकती क्योंकि तब कोई उनकी देखभाल करने वाला नहीं होगा.नोक्यूबॉन्गा की वकील याद करती हैं कि मां-बेटी से उनकी पहली मुलाकात हमले के एक हफ़्ते बाद हुई थी और ऐसा लग रहा था जैसे दोनों ने हिम्मत छोड़ दी हो.

उन्होंने कहा, “जब आप ग़रीब लोगों से मिलते हैं तो ऐसा लगता है जैसा न्याय व्यवस्था सिर्फ़ पैसे वालों के लिए है. जब मैं नोक्यूबॉन्गा से बात कर रही थी तब सिफोकाज़ी चुपचाप हमें देख रही थी. ऐसा लग रहा था जैसे हमले के बाद वो बोलना ही भूल गई हो.”नोक्यूबॉन्गा की वकील इस बात को लेकर तो आश्वस्त थीं कि हमला उन्होंने आत्मरक्षा के लिए था और वो अदालत में इस बात को मज़बूती से रख भी पाएंगी लेकिन साथ ही उन्हें डर भी था कि कहीं वो बीच में निराश होकर हिम्मत न हार बैठें.हालांकि ये मामला सामने आने के बाद उन्हें मीडिया से जैसी मदद मिली वो अभूतपूर्व थी. उनके बारे में हर ओर बातें होने लगीं और लोग नोक्यूबॉन्गा को ‘लायन मम्मा’ (शेरदिल मां) कहने लगे.

जब नोक्यूबॉन्गा पर हत्या का मुक़दमा चलाया गया तो लोगों ने इसका ज़ोरदार विरोध किया. उनके लिए पैसे इकट्ठा करके क़ानूनी मदद जुटाई जाने लगी. इन सबसे नोक्यूबॉन्गा का हौसला भी बढ़ा.वो कहती हैं, “मुझे अदालत जाते हुए बहुत डर लग रहा था. मैंने उस दिन सुबह की शुरुआत प्रार्थना से की थी लेकिन जब हम अदालत पहुंचे तो वहां लोगों को अपने साथ खड़े पाया. दक्षिण अफ़्रीका के अलग-अलग हिस्सों से लोग हमारा साथ देने के लिए आए थे.”उन्हें जल्दी ही मजिस्ट्रेट के सामने बुलाया गया. वो बताती हैं, “अदालत में मुझे बताया गया कि मुझ चल रहा हत्या का मामला वापस ले लिया गया है. उस वक़्त मुझे अहसास हआ कि न्याय व्यवस्था सही और ग़लत का फ़र्क समझ सकती है. अदालत समझ गई थी कि मेरा इरादा किसी की जान लेने का नहीं था.”

सिफाकोज़ी कहती हैं, “मैं ख़ुश हूं. मुझे थोड़ा सुरक्षित भी महसूस होता है लेकिन कहीं न कहीं मुझे लगता है कि उन्हें उम्रक़ैद होनी चाहिए थी.”अदालत का फ़ैसला आने के बाद सिफाकोज़ी ने अपना नाम सार्वजनिक करने का मन बनाया ताकि बाकी रेप सर्वाइवर्स को भी हिम्मत मिल सके.वो कहती हैं, “मैं सबको बताना चाहती हूं कि बलात्कार के बाद भी ज़िंदगी है. बलात्कार के बाद भी आप समाज का हिस्सा हैं और अपने सपने पूरे कर सकते हैं.”नॉक्यूबॉन्गा उम्मीद करती हैं कि उनकी बेटी के बलात्कारी जेल से आने के बाद बेहतर और बदले हुए इंसान होंगे.

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