वो जगह जहां गांधी में पनपा अहिंसा का बीज

ट्रेन के अंग्रेज़ कंडक्टर ने गांधी को निचले दर्जे के मुसाफ़िरों के डब्बे में जाने को कहा. जब गांधी ने कंडक्टर को अपना पहले दर्जे का टिकट दिखाया, तो भी वो माना नहीं और मोहनदास गांधी को बेइज़्ज़त कर के ट्रेन से ज़बरदस्ती उतार दिया.महात्मा गांधी बम्बई से 1893 में वकालत करने के लिए दक्षिण अफ्रीका गए थे. उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले भारतीय मूल के एक कारोबारी की कंपनी के साथ एक साल का क़रार किया था. ये कंपनी ट्रांसवाल इलाक़े में थी.

गांधी के वहां पहुंचने से काफ़ी पहले से ट्रांसवाल में भारतीयों की आबादी तेज़ी से बढ़ रही थी. 1860 में भारत सरकार के साथ हुए करार के तहत ट्रांसवाल की सरकार ने वहां भारतीयों को एक शर्त पर आकर बसने में मदद करने का वादा किया. शर्त ये थी कि भारतीय मूल के लोगों को वहां के गन्ने के खेतों में बंधुआ मज़दूरी करनी होगी.

लेकिन, मज़दूरी का वक़्त गुज़ार लेने पर भी भारतीय मूल के लोगों को समाज के अन्य वर्गों से मेल-जोल करने नहीं दिया जाता था. उन्हें बाहरी माना जाता था. गोरों की अल्पसंख्यक सरकार, भारतीयों पर ज़्यादा टैक्स लगाती थी.दक्षिण अफ्रीका पहुंचते ही महात्मा गांधी को नस्लीय भेदभाव का शिकार होना पड़ा.प्रिटोरिया जाने के सफ़र की घटना से पहले गांधी के साथ एक और घटना डरबन में हुई थी. जब एक अदालत में जज ने उनसे पगड़ी उतारने को कहा, तो वो अदालत से बाहर आ गए थे.

अपनी आत्मकथा में महात्मा गांधी ने लिखा है कि, ‘ऐसे मौक़े पर अपनी ज़िम्मेदारी निभाने के बजाय भारत लौटना कायरता होता. मैंने जो मुश्किलें झेलीं वो तो बहुत मामूली थीं. असल में ये रंगभेद की गंभीर बीमारी के लक्षण भर थे. मैंने तय किया कि इस रंगभेद के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाकर लोगों को रंगभेद की बीमारी से बचाने के लिए मुझे कम से कम कोशिश तो करनी ही चाहिए.’स्थानीय गाइड शाइनी ब्राइट कहते हैं कि, ‘महात्मा गांधी के लिए ये मौक़ा ज्ञान प्राप्त करने का था. इससे पहले वो एक शांत और कमज़ोर इंसान थे.’

पीटरमारित्ज़बर्ग की घटना के बाद गांधी ने भेदभाव के आगे घुटने टेकने से इनकार कर दिया. वो शांतिपूर्ण और अहिंसक तरीक़े से रंगभेदी नीतियों के ख़िलाफ़ आंदोलन करने लगे.उन्होंने हड़ताल, विरोध-प्रदर्शन और धरनों के ज़रिए वोटिंग और काम करने में रंगभेद के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद की. महात्मा गांधी को यक़ीन था कि दक्षिण अफ्रीका में रहकर ही उन्हें रंगभेद के सबसे ख़ौफ़नाक चेहरे को देखने का मौक़ा मिल सकता था. तभी वो इसका मुक़ाबला कर के उस पर जीत हासिल कर सकते थे.

1907 में जब ट्रांसवाल की सरकार ने एशियाटिक लॉ अमेंडमेंट एक्ट बनाया तो गांधी ने इसके ख़िलाफ़ अहिंसक आंदोलन छेड़ दिया. इस क़ानून के तहत भारतीयों को दक्षिण अफ्रीका में अपना रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य कर दिया गया था. आंदोलन के दौरान गांधी को कई बार जेल जाना पड़ा. लेकिन, आख़िर में वो गोरों की सरकार से समझौता कराने में कामयाब हुए. 1914 में इंडियन रिलीफ़ एक्ट पास कर के भारतीयों पर अलग से लगने वाला टैक्स भी ख़त्म किया गया. इससे भारतीयों की शादी को भी सरकारी मान्यता मिलने लगी.

महात्मा गांधी की याद में दक्षिण अफ्रीका ने फ्रीडम ऑफ़ पीटरमारित्ज़बर्ग नाम से पुरस्कार शुरू किया. इसे लेते हुए नेल्सन मंडेला ने कहा था, ‘सहिष्णुता, आपसी सम्मान और एकता के जिन मूल्यों के लिए गांधी ने संघर्ष किया, उसने मेरे ऊपर गहरा असर डाला है. इसका हमारे स्वतंत्रता आंदोलन ही नहीं मेरी सोच पर भी बहुत असर पड़ा.’आज दक्षिण अफ्रीका का ये रेलवे स्टेशन भारतीयों के लिए एक तीर्थस्थल की तरह है. दक्षिण अफ्रीका आने वाले बहुत से भारतीय यहां गांधी को श्रद्धांजलि देने आते हैं.जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2016 में यहां आए, तो उन्होंने यहां की मेहमानों की नोटबुक में लिखा कि, ‘पीटरमारित्ज़बर्ग में हुई एक घटना ने भारत के इतिहास का रुख़ ही बदल दिया.’

जून 2018 में महात्मा गांधी के साथ हुई उस घटना की 125वीं सालगिरह पर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी पीटरमारित्ज़बर्ग आई थीं. उन्होंने महात्मा गांधी के दौर सरीखी ट्रेन में पेंट्रिच से पीटरमारित्ज़बर्ग तक का सफ़र भी किया था. पीटरमारित्ज़बर्ग पहुंचने पर स्वराज ने स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर लगी महात्मा गांधी की मूर्ति का अनावरण भी किया था.

इस मूर्ति को हैदराबाद के महात्मा गांधी डिजिटल म्यूज़ियम में डिज़ाइन किया गया था. इसमें गांधी को युवा बैरिस्टर के रूप में दिखाया गया है, जो सूट और टाई पहने हुए हैं. साथ ही इस मूर्ति के दूसरे रुख में उन्हें चश्मा लगाए हुए बुज़ुर्ग के तौर पर दिखाया गया है जिन्होंने धोती पहन रखी है.दो दिन के उस कार्यक्रम में गांधी को ट्रेन से धक्का देकर उतारने की घटना का नाटकीय मंचन भी किया गया था. इसके बाद उस घटना की याद में एक दावत भी रखी गई. तब भारत का तिरंगा स्थानीय सिटी हॉल में लहराया गया था.

आज की तारीख़ में दक्षिण अफ्रीका में सबसे ज़्यादा भारतीय मूल के लोग रहते हैं. दक्षिण अफ्रीका में उनका रसूख ज़ाहिर है. आज दूसरी और तीसरी पीढ़ी के भारतीय मूल के लोग यहां कारोबार करते हैं. वो सरकारी नौकरी भी करते हैं. साथ ही भारतीय मूल के लोग खेलों में भी दक्षिण अफ्रीका की नुमाइंदगी करते हैं.

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