पंडित नेहरु नहीं, ‘बरकतुल्ला खान’ थे भारत के पहले प्रधानमंत्री!

इस बात के पुख्ता ऐतिहासिक दस्तावेज मौजूद हैं कि हिंदुस्तान में आजादी से पहले ही सरकार बन गई थी. विधिवत इस सरकार का गठन हिंदुस्तान की ही एक पार्टी ने किया था. इसमें हिंदुस्तान के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भी चुने गए थे. साथ में कुछ मंत्रियों ने भी पद और गोपनीयता की शपथ ली थी. इस सरकार को रूस, अफगानिस्तान, जापान और तुर्की सरीखे ब्रिटेन के विरोधी देशों का भरपूर समर्थन भी प्राप्त था.

बात यहां तक बढ़ गई थी कि अंग्रेजी हुकूमत को इस सरकार को गिराना पड़ा. इसलिए यह एक अल्पकालीन सरकार बनकर ही रह गई. लेकिन इसी सरकार को हिंदुस्तान की पहली सरकार और इस दौरान चुने गए प्रधानमंत्री को देश का पहला पीएम माना जाता है.

यह सरकार थी, गदर पार्टी की. गदर पार्टी की स्‍थापना 13 मार्च 1913 को हुई था. इसके बाद 120 भारतीयों का एक सम्मेलन आयोजित किया गया. इसे एक ठोस ब्रिटिश विरोधी कदम माना गया. भारत के बाहर भी इस पार्टी की चर्चा तेजी से बढ़ी. इस पार्टी में जल्द ही विदेश से सोहन सिंह बहकना और लाला हरदयाल जैसे लोग शामिल हो गए.गदर पार्टी का उद्देश्य हिंदुस्तान से अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकना और जनतांत्रिक व धर्म निरपेक्ष गणराज्य की स्थापना करना था. पार्टी और इसके संस्‍थापक मौलाना बरकतुल्ला की ओर से करीब डेढ़ साल तक साप्ताहिक गदर के प्रकाशन ने उनकी छवि एक क्रांतिकारी लेखक और दूरदृष्टि वाले व्यक्ति की बना दी.

साप्ताहिक गदर तेजी से फैलने लगा था. बरकतुल्ला खान के अलावा इसमें चम्पक रामन पिल्लई, भूपेन्द्रनाथ दत्ता, राजा महेंद्र प्रताप और अब्दुल वहीद खान जैसे लोग भी इसमें लिखने लगे. हिंदुस्तान की आजादी को लेकर इनका धारदार लेखन और इनके लेखों में राजनैतिक सूझबूझ की चर्चा अमेरिका से लेकर जर्मनी तक होने लगी.

जैसे-जैसे साप्ताहिक गदर की ख्याति बढ़ती गई वैसे-वैसे इस पार्टी और इसके नेताओं के ब्रिटिश दुश्मन भी बढ़ते गए. लेकिन जले पर नमक का काम उस घटना ने किया जब गदर पार्टी के बरकतुल्ला खान और राजा महेंद्र प्रताप के संयुक्त प्रयास से प्रथम विश्व युद्ध में बर्लिन में लड़ रहे हिंदुस्तान सैनिकों ने अंग्रेजों के लिए लड़ने से मना कर दिया. ब्रिटिश सरकार ने इसे बगावत के तौर देखा. इसके बाद राजा महेंद्र और बरकतुल्ला अंग्रेजी सरकार से लोहा लेने के उद्देश्य से तुर्की, बगदाद और फिर अफगानिस्तान के सफर निकल गए. दोनों का ये कदम ब्रिटिश सरकार को नागवार गुजरा.

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